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Thursday, October 15, 2009

.......गुजरे.......

जिंदगी के सुकून भरे पल तो मयकदे में गुज़रे
हम न कभी गुजरेंगे तेरे कुचे से मगर
तेरे साथ बीते पल कहाँ जिंदगी से गुजरे


सब-ओ-रोज़ इंतज़ार के ख़त्म न हुई कभी
हम गुज़रे चमन-ए-गुलज़ार से मगर
कहाँ मेरी जिंदगी के खिजा गुज़रे


याद आती है अब भी तेरी हंसते रुखसार
हम गुज़रे बाग़-ए-गुलाब से मगर
कहाँ मेरी निगाह से वो हंसते रुखसार गुजरे


अब तो हम भी हो गए है संग-ए-दिल तेरे बैगैर
गुजरते है जहाँ-ए-बुत से मगर
कहाँ किसी से इतनी बेदिली से गुज़रे


कहाँ गुम गए पाकीजा-ए-अल्फाज़ तेरे ग़ज़ल से "निवास"
के मुकमल न हुई इश्क तो तुम लिखते हाल-ए-बेबसी गुज़रे

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