........ असर ...........
फर्क तुझमे और खुदा में महज इतना है
के तू आज भी मेरी नम आँखों को महसूस होता है
और खुदापरस्ती फकत मेरी हाल-ए-बेबसी का असर है
तुझे भूल जाऊं मैं इतना खुदगर्ज़ नहीं
मगर फिर भी जो ज़ख्म तुने दिया था मुझे वो भर रहा है
माना के ये मुमकिन नहीं है मगर
फिर भी इस दिलजले पर भी वक़्त ने किया असर है
मुझे याद नहीं के किस शब्-ए-फिराक में तू मुझे याद न आया
पर आरजू यही है के अब तम्मना-ए-विसाल तम्माम हो जाये
हसरत नहीं है फिर भी मगर
तेरी दुआ ने भी मुझ पर किया असर है
कब तक दर्द-ए-दिल लिखते रहोगे
कर दो ये ग़ज़ल भी तमाम "निवास"
आखिर तुझ पर मयकसी भी कर रही असर है
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