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Tuesday, October 20, 2009

.......इरादा.......

अब ज़हर बन के घुल जा मुझमें ,
कि अब  जीने का इरादा तो नहीं
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे,
तो साथ मरने का वादा ही सही

अब न शराब है, न शबाब है,
फिर भी लहू में घूमता है नशा
नशे में नहीं हूँ फिर भी,
होश में आने का इरादा तो नहीं

मैं जानता हूँ,
तुम नहीं हो मेरे आसपास
पर कभी कभी जब छूती है हवा तो सोचता हूँ,
कहीं ये तुम्हें छु कर आया तो नहीं

अब हर शाम को,
मैं देखता हूँ अपनी दो परछाई
एक तो मेरा है,
दूसरा कहीं तेरा साया तो नहीं

हर पल तुम्हें सोचता हूँ,
कि भूल जाऊं तुम्हें
पर तुम्हें भूल कर जीएँ कैसे,
इसलिए भूलने का इरादा तो नहीं

अब सोचता हूँ,
ख़त्म कर दूं शाम-ए-गम की दास्ता "निवास"
पर जिंदगी है इसी गम से,
इसीलिए ख़त्म करने का इरादा तो नहीं

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