सूरज के धुंधलके से ,
एक चिराग-ए-अफताब सा महसूस होता है
जो न था मेरे तेरे दरमियाँ ,
वो फासला क्यों मीलों दूर सा महसूस होता है
बोझिल आँखों से ,
ढूढ़ते है अफताब को उस धुंधलके में
कहीं दूर जैसे ,
हम जमीं और वो फलक सा महसूस होता है
याद है जब तुने मुझे ,
उठती लहरों की तरह लिया था आगोश में
और मैं कहता रहा ,
तू मुझे खुदा सा महसूस होता है
लेता हूँ साँस जब ,
इन हवाओं के झोकों में
तो ,
तेरी दुपट्टे की खुशबू सा महसूस होता है
मैं समझने लगा था खुद को पहारोँ की तरह ,
करता हुआ देखभाल जो
फैला हो तुम्हारे इर्द-गिर्द
मगर वो पहार अब रेत के टीलो सा महसूस होता है
मैं लहर था ,
और तुम किनारा
अब तेरे बिना ,
ये जिंदगी बेकिनारा सा महसूस होता है
कहते थे ,
के मर मिटेंगे तुम पर
के मर मिटेंगे तुम पर
मरते मरते ,
अब ये जिंदगी मौत सा महसूस होता है
नहीं आता है छुपाना राज आँखों में तुम्हें "निवास"
तुम्हारी आँखों में उसी जालिम का अक्स सा महसूस होता है
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