Pages

Tuesday, October 20, 2009


.......गोवा के तट पर......

सूरज के धुंधलके से ,
एक चिराग-ए-अफताब सा महसूस होता है
जो न था मेरे तेरे दरमियाँ ,
वो फासला क्यों मीलों दूर सा महसूस होता है

बोझिल आँखों से ,
ढूढ़ते है अफताब को उस धुंधलके में
कहीं दूर जैसे ,
हम जमीं और वो फलक सा महसूस होता है

याद है जब तुने मुझे ,
उठती लहरों की तरह लिया था आगोश में
और मैं कहता रहा ,
तू मुझे खुदा सा महसूस होता है

लेता हूँ साँस जब ,
इन हवाओं के झोकों में
तो ,
 तेरी दुपट्टे की खुशबू सा महसूस होता है

मैं समझने लगा था खुद को पहारोँ  की तरह ,
करता हुआ देखभाल जो
फैला हो तुम्हारे इर्द-गिर्द
मगर वो पहार अब रेत के टीलो सा महसूस होता है 

मैं लहर था ,
और तुम किनारा 
अब तेरे बिना ,
ये जिंदगी बेकिनारा सा महसूस होता है 

कहते थे ,
के मर मिटेंगे तुम पर 

मरते मरते ,
अब ये जिंदगी मौत सा महसूस होता है 

नहीं आता है छुपाना राज आँखों में तुम्हें "निवास"
तुम्हारी आँखों में उसी जालिम का अक्स सा महसूस होता है   

No comments:

Post a Comment