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Tuesday, October 20, 2009

.......इरादा.......

अब ज़हर बन के घुल जा मुझमें ,
कि अब  जीने का इरादा तो नहीं
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे,
तो साथ मरने का वादा ही सही

अब न शराब है, न शबाब है,
फिर भी लहू में घूमता है नशा
नशे में नहीं हूँ फिर भी,
होश में आने का इरादा तो नहीं

मैं जानता हूँ,
तुम नहीं हो मेरे आसपास
पर कभी कभी जब छूती है हवा तो सोचता हूँ,
कहीं ये तुम्हें छु कर आया तो नहीं

अब हर शाम को,
मैं देखता हूँ अपनी दो परछाई
एक तो मेरा है,
दूसरा कहीं तेरा साया तो नहीं

हर पल तुम्हें सोचता हूँ,
कि भूल जाऊं तुम्हें
पर तुम्हें भूल कर जीएँ कैसे,
इसलिए भूलने का इरादा तो नहीं

अब सोचता हूँ,
ख़त्म कर दूं शाम-ए-गम की दास्ता "निवास"
पर जिंदगी है इसी गम से,
इसीलिए ख़त्म करने का इरादा तो नहीं

.......गोवा के तट पर......

सूरज के धुंधलके से ,
एक चिराग-ए-अफताब सा महसूस होता है
जो न था मेरे तेरे दरमियाँ ,
वो फासला क्यों मीलों दूर सा महसूस होता है

बोझिल आँखों से ,
ढूढ़ते है अफताब को उस धुंधलके में
कहीं दूर जैसे ,
हम जमीं और वो फलक सा महसूस होता है

याद है जब तुने मुझे ,
उठती लहरों की तरह लिया था आगोश में
और मैं कहता रहा ,
तू मुझे खुदा सा महसूस होता है

लेता हूँ साँस जब ,
इन हवाओं के झोकों में
तो ,
 तेरी दुपट्टे की खुशबू सा महसूस होता है

मैं समझने लगा था खुद को पहारोँ  की तरह ,
करता हुआ देखभाल जो
फैला हो तुम्हारे इर्द-गिर्द
मगर वो पहार अब रेत के टीलो सा महसूस होता है 

मैं लहर था ,
और तुम किनारा 
अब तेरे बिना ,
ये जिंदगी बेकिनारा सा महसूस होता है 

कहते थे ,
के मर मिटेंगे तुम पर 

मरते मरते ,
अब ये जिंदगी मौत सा महसूस होता है 

नहीं आता है छुपाना राज आँखों में तुम्हें "निवास"
तुम्हारी आँखों में उसी जालिम का अक्स सा महसूस होता है   

Thursday, October 15, 2009

.......गुजरे.......

जिंदगी के सुकून भरे पल तो मयकदे में गुज़रे
हम न कभी गुजरेंगे तेरे कुचे से मगर
तेरे साथ बीते पल कहाँ जिंदगी से गुजरे


सब-ओ-रोज़ इंतज़ार के ख़त्म न हुई कभी
हम गुज़रे चमन-ए-गुलज़ार से मगर
कहाँ मेरी जिंदगी के खिजा गुज़रे


याद आती है अब भी तेरी हंसते रुखसार
हम गुज़रे बाग़-ए-गुलाब से मगर
कहाँ मेरी निगाह से वो हंसते रुखसार गुजरे


अब तो हम भी हो गए है संग-ए-दिल तेरे बैगैर
गुजरते है जहाँ-ए-बुत से मगर
कहाँ किसी से इतनी बेदिली से गुज़रे


कहाँ गुम गए पाकीजा-ए-अल्फाज़ तेरे ग़ज़ल से "निवास"
के मुकमल न हुई इश्क तो तुम लिखते हाल-ए-बेबसी गुज़रे

........ असर  ...........

फर्क तुझमे और खुदा में महज इतना है
के तू आज भी मेरी नम आँखों को महसूस होता है
और खुदापरस्ती फकत मेरी हाल-ए-बेबसी का असर है


तुझे भूल जाऊं मैं इतना खुदगर्ज़ नहीं
मगर फिर भी जो ज़ख्म तुने दिया था मुझे वो भर रहा है
माना के ये मुमकिन नहीं है मगर
फिर भी इस दिलजले पर भी वक़्त ने किया असर है


मुझे याद नहीं के किस शब्-ए-फिराक में तू मुझे याद न आया
पर आरजू यही है के अब तम्मना-ए-विसाल तम्माम हो जाये
हसरत नहीं है फिर भी मगर
तेरी दुआ ने भी मुझ पर किया असर है


कब तक दर्द-ए-दिल लिखते रहोगे
कर दो ये ग़ज़ल भी तमाम "निवास"
आखिर तुझ पर मयकसी भी कर रही असर है

Saturday, October 3, 2009

........दुनिया........

यहाँ मंजिल सिर्फ शमसान  होती है
जिंदगी हुस्न की गुलाम होती है
दुनिया दौलत से सलाम होती है
लो हमने भी छोड़ दी शायरी
पर यहाँ महफ़िल तो हर शाम होती है